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लटोरी तहसील में शासकीय भूमि घोटाला — तहसीलदार पर ₹1 लाख रिश्वत और राजनीतिक दबाव में अवैध नामांतरण के गंभीर आरोप

लटोरी तहसील में शासकीय भूमि घोटाला — तहसीलदार पर ₹1 लाख रिश्वत और राजनीतिक दबाव में अवैध नामांतरण के गंभीर आरोप

सूरजपुर/लटोरी।लटोरी तहसील एक बार फिर सुर्खियों में है और इस बार मामला सीधे-सीधे शासकीय भूमि की अवैध बिक्री और नामांतरण से जुड़ा है। तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा पर आरोप है कि उन्होंने नियम-कानून को ताक पर रखकर न केवल फर्जी नामांतरण किया, बल्कि इसके बदले ₹1,00,000 की मोटी रिश्वत भी ली।

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नियम साफ, लेकिन तहसीलदार ने तोड़े

राजस्व नियमों के अनुसार—

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शासकीय मत से प्राप्त भूमि की बिक्री के लिए कलेक्टर की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।नामांतरण से पहले पटवारी का प्रतिवेदन, सीमांकन और सत्यापन जरूरी है।बिना अनुमति किया गया नामांतरण अवैध और निरस्त करने योग्य है।लेकिन लटोरी तहसील में ये सारे नियम सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गए।

आरोपों की जाँच में सामने आए तथ्य

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1. बिना अनुमति नामांतरण — त्र्यंबक प्रसाद गुप्ता की शासकीय भूमि का नामांतरण बिना कलेक्टर की अनुमति कर दिया गया।

2. पटवारी की अनदेखी — नामांतरण प्रक्रिया में संबंधित पटवारी का प्रतिवेदन तक नहीं लिया गया। पटवारी ने खुद कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी।

3. रिश्वत का आरोप — सूत्रों के मुताबिक, तहसीलदार ने त्र्यंबक गुप्ता और संजय गुप्ता से ₹1 लाख लेकर दस्तावेज़ों पर साइन किए।

4. निर्माण कार्य शुरू — नामांतरण अधूरा रहते हुए भी खरीदार ने शासकीय भूमि पर मकान बनाना शुरू कर दिया।

राजनीतिक दबाव का खेल

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि लटोरी में कुछ “स्वघोषित नेता” हैं जो सत्ता बदलते ही अपनी वफ़ादारी बदल लेते हैं। कभी बीजेपी, कभी कांग्रेस—जहाँ फायदा दिखा, वहीं खड़े हो जाते हैं। ऐसे लोग भू-माफियाओं के साथ मिलकर तहसील प्रशासन पर दबाव डालते हैं, और अधिकारियों को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करते हैं।

तहसीलदार का रवैया संदिग्ध

तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने स्वीकार किया कि उनसे गलती हुई है।

सवाल ये है कि गलती “अनजाने में” हुई या रिश्वत और राजनीतिक दबाव के कारण…?

जब दस्तावेज़ों में पटवारी के हस्ताक्षर नहीं थे, तो इतनी जल्दबाजी क्यों

सूत्रों का दावा

एक सूत्र का कहना है कि तहसीलदार ने खरीदार से वादा किया कि अपने ट्रांसफर से पहले इस नामांतरण को कागजों में “वैध” कर देंगे ताकि मामला दबा रहे।

उच्च अधिकारियों तक पहुंच सकता है मामला

जनता में यह चर्चा है कि इतने बड़े मामले में तहसीलदार की हिम्मत अकेले की नहीं हो सकती। शक है कि इस “खेल” में ऊपर तक हिस्सा बंटा हो, इसलिए अभी तक किसी बड़े अफसर ने इस पर कार्रवाई नहीं की है।

कानूनी कार्रवाई की संभावना

अगर जांच में आरोप साबित हुए, तो:

तहसीलदार पर विभागीय जांच, निलंबन और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत FIR हो सकती है।खरीदार के खिलाफ कब्जा हटाने और दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है।भूमि रजिस्ट्री निरस्त की जा सकती है।,अब गेंद प्रशासन के पाले में

लोगों की निगाहें अब जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या तहसीलदार पैकरा इस रजिस्ट्री को निरस्त करने के लिए कलेक्टर को प्रस्ताव भेजेंगे या अपने ट्रांसफर का इंतजार कर मामला दबा देंगे?

यदि कार्रवाई हुई, तो यह प्रशासन की साख बचाएगी, लेकिन अगर चुप्पी रही, तो यह साफ हो जाएगा कि लटोरी तहसील में कानून नहीं, बल्कि रसूख और रिश्वत का राज चलता है।

 

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